बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

एक चिंताग्रस्त महिला डोक्टर के पास जाती है: 'डॉक्टर, मुझे एक प्रॉब्लम है, और आपकी मदद चाहिए! मेरा बच्चा अभी एक साल का भी नहीं हुआ और मै फिरसे pregnant हूँ. I don't want kids so close together.

तब डोक्टर पूछता है: 'ठीक है, तो मै क्या कर सकता हूँ आपके लिए?'

महिला: 'मै चाहती हूँ के आप मेरी प्रेगनेंसी रोक दो.. मै आपकी शुक्रगुज़ार रहूंगी.'

डोक्टर ने थोड़ी देर सोचा और कुछ देर शांत रहने के बाद उसने महिला से कहा: 'मेरेपास इस से अच्छा solution है आपकी प्रॉब्लम के लिए. जिसमे आपको खतरा भी कम है.'

वो मुस्कुराई, उसे लगा के डोक्टर उसका काम कर ही देगा अब.

डोक्टर बोला: "देखो जैसे तुमने कहा की तुम एक समय पर दो बच्चो की देखभाल नहीं कर सकती, तो वही बच्चा मार देते है जो अभी तुम्हारे पास है. इस तरह तुम्हे  दूसरा बच्चा पैदा होने से पहले 
आराम और वक्त भी मिल जायेगा. अगर हमें दोनों में से किसी को मारना ही है तो क्या फर्क पड़ता है 'पहला या दूसरा' से."

महिला थोड़ी घबराई और बोली: "नहीं डोक्टर, कितना भयानक है ऐसा करना.'I agree',"

डोक्टर बोला. "लेकिन तुम तोह कुछ ऐसे ही कह रही थी, इसलिए मैंने सोचा की यही बेहतर उपाय होगा."

डोक्टर हसा, उसने उसकी बात समझा दी थी. उसने उस माँ को इस बात से सहमत कराया था की , "पैदा बच्चे को मरना और पैदा होनेवाले बच्चे को मरना इसमें कोई फर्क नहीं है. The crime is the same!

अगर आप इस बात से सहमत है तो please SHARE करे.

हम सब मिल कर कई महत्वपूर्ण जिन्दगिया बचा सकते है!

अंत में "प्यार माने खुदकी ज़िन्दगी दुसरो के हित के लिए sacrifice करना"

Abortion माने किसी और की ज़िन्दगी अपने हित के लिए sacrifice करना..

बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

garba ..........





चारो तरफ नवरात्र का भक्तिमय माहौल है...कही पर भक्ति से परिपूर्ण माता के जगराते हो रहे है तो कही भक्तो के लिए भंडारे चल रहे है ....ऐसे में नवरात्र में एक स्थान और है जहा logo का हुजूम खासकर युवक और नवयुवतियो का लगता है जहा देर रात कही कही तो सुबह होते होते तक भक्ति में डूबे भक्त नजर आते है वह स्थान है गरबा ....माता की स्तुति लिए भक्त जन देर रात तक भक्ति में थिरकते नजर आते है...लेकिन पिछले कुछ वर्षो से गरबा कहे या डांडिया इसके स्वरूप में बहुत बदलाव सा आया  है जहा पारम्परिक वाद्य यंत्रो ढोल की जगह DJ और भारी भरकम साउंड ने ले ली है वही अब इस भक्ति और आराधना की जगह व्यवसायिकता ने अपने पैर पसार लिए है जंहा महंगे सेलिब्रिटी बुलाये जाते है माता की तस्वीर एक किनारे रख दी जाती है जिस ओर किसी का भी ध्यान नहीं जाता  देर रात तक टीन एजर्स लड़के लडकिया घरो से बहार रहती है और तो और कही कही पर तो माता पिता को ही नहीं पता होता की उनकी लड़की किस गरबे में है..और किसके साथ है पिछले कुछ वर्षो में गरबे में आये इस परिवर्तन और आधुनिकता को लेकर प्रसिद्ध पत्रिका इंडिया टुडे ने गुजरात में एक सर्वे करवाया था जिसमे चौकाने वाले तथ्य सामने आये थे ....जो की शर्मनाक है...प्रसिद्ध समाचार एजेंसी में छपी खबर को यहाँ ज्यो का त्यों आपके सामने रखा जा रहा है..As garba season sizzles, condom sales hot up
Published: Monday, Oct 6, 2008, 4:01 IST .....
AHMEDABAD: A sure indication that the garba season is beginning to simmer is Ahmedabad pharmacists’ estimate that the sale of condoms and contraceptives has 
increased by up to 25%.
According to the Ahmedabad Chemists Association, the figure is consistent with the past Navaratri trends. Usually, the sale of emergency contraceptive pills and 
condoms rise by 20-25% during the festival.
According to an Ahmedabad-based psychiatrist, Dr. Mrugesh Vaishnav, young people enjoy a degree of personal freedom during Navaratri that is rarely granted to them at other times. The slackening of parental rules and supervision allows some of the youth to explore intimacy with the opposite sex. “Young people are excited by the festive mood and as a result, moral barriers are broken,” Vaishnav said. “It can also be viewed as an act of defiance against social norms.”
Amid the raging twirl of hormones, which is viewed with disdain in many quarters, there lies some reassuring news: boys and girls revelling in unmonitored liberty are at least aware of the risks, especially Aids.  कृपया इस पर विचार करे भक्तिमय और श्रद्धा के इस पर्व में इस तरह की विकृतियों को दूर करने में सहायक बने तभी सच्चे अर्थो में हमारी शक्ति की देवी के प्रति सच्ची आराधना होगी... 

रविवार, 2 अक्तूबर 2011

तेरा क्या होगा जनता....................


  1. चिदम्बरम प्रणय मुखर्जी में सुलह हो गई पुरे देश ने राहत की सांस ली ...ऐसे जैसे देश की सारी समस्याए ही ख़त्म हो गयी ....कभी कभी लगता है की मिडिया ने इस देश को उस बच्चे जैसा बना दिया है जिसे कोई चाकलेट या कोई खिलौना देकर बहलाया जा सकता है ....हाल ही में जब पूरा देश भ्रस्टाचार , आतंकवाद , नक्सलवाद , विदेशो में जमा कला धन जैसे मुद्दों से जूझ रहा था , महंगाई देश के आम नागरिको की कमर तोड़ रही थी ऐसे में प्रायोजित मिडिया ने एक आन्दोलन खड़ा किया अन्ना टीम का आन्दोलन ...ऐसे लगने लगा की अब इस आन्दोलन से पुरे देश की समस्या इस बार तो खत्म हो ही जाएगी ....आजादी की दूसरी लड़ाई का इसे नाम दिया गया ...क्या महिलाये क्या बच्चे क्या बुजुर्ग क्या युवा सभी इस आन्दोलन में कूद पड़े..युवतिया अपने गालो में तिरंगे के टेटू बनवाकर निकल पड़ी पुरे देश में एक उत्सव सा माहौल बन गया ....लगा की अब ये बिल पास होकर ही रहेगा...इस आन्दोलन से दिल्ली की शीला दीक्षित और पी. चिदम्बरम जो की भ्रष्टाचार की भेट चढ़ने वाले थे बच गए ...देश में काला धन वापस लाने की मुहीम ढंडी पढ़ गयी..लोकसभा राज्य सभा में देर रात तक बहस हुई इस प्रायोजित नौटंकी को मिडिया ने खूब दिखाया ....फायदे में रहे अन्ना टीम के केजरीवाल प्रशांत भूषण मनीष सिसोदिया जैसे लोग या फिर फायदा मिला तो कांग्रेस को बेवकूफ बनी तो सिर्फ और सिर्फ इस देश की जनता ....क्या हुआ बिल का किसी को नहीं मालूम सब के सब ढंडे पढ़ गए अन्ना रालेगाओ चले गए टीम अन्ना के लोग भटक गए अब नेतागिरी करे तो कहा करे..प्रशांत भूषण ने कश्मीर को अलग करने जनमत सर्वेक्षण करवाने और सेना वापस बुलाने की वकालत करनी शुरू कर दी मेघा पटाकर ने नक्सलियों के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया..बच गए केजरीवाल तो वे बिग बॉस के सेलीब्रिटी बननेके जुगाड़ में लग गए...ऐसे में बेचारे अन्ना ने भी चुनाव लड़ाने की बात कह डाली जो कल तक राजनीती को गन्दी दलदल कहते थे जिन्होंने हमेसा इस बात का विरोध किया ..चुनाव प्रणाली पर प्रश्न खड़े किये .. कभी भी जनप्रतिनिधियों के माध्यम से देश में सुधार के पक्षधर कभी नहीं रहे .. यह परिवर्तन कोई आश्चर्य का विषय नहीं है... लेकिन प्रश्न यह है की शोले फिल्म की ही तरह ये डायलाग की "तेरा क्या होगा जनता" ....लेकिन इतना तो है की जनता भी जानती है की उसका भला नहीं होने वाला....

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

भगत सिंह ............


  • आज ही के दिन एक सौ चार वर्ष पूर्व पहले अविभाजित हिंदुस्तान के लायलपुर जिले बंगा (जो की अब पाकिस्तान में है) की भूमि पर ऐसी सख्शियत ने जन्म लिया था, जो इस दुनिया में महज 23 वर्ष 5 माह 27 दिन रहने के बाद अपने वतन की आजादी के लिए गर्व से फांसी पर हसते हसते झूल गए और जो इस दृश्य को देखने के लिए मजबूर थे, वे रो पड़े ..इस अमर शहीद को सारी दुनिया में भगत सिंह के नाम से जाना जाता है.. भगत सिंह उल्का पिंड की तरह भारतीय क्षितिज पर अवतरित हुए थे ..अपनी शहादत से पहले वे हर देशवासी के मन में चेतना और आकंछाओ के प्रतीक बन चुके थे .उन्होंने लोगो को ये बताया की शोषण और जुल्म करने वालो में देशी और विदेशी का अंतर बेमानी होता है ..आज अंग्रेज नहीं है लेकिन देश में लुटेरे है जो देश को लुट रहे है..भगत सिंह ने देश से प्रेम किया समाज को बदलना चाहा घर परिवार को समाज का अंग जानकर समाज आजाद और बेहतर बनाना चाहा ..ये युवा मन का आत्मस्वाभिमान ही तो था .. इस देश की आजादी के लिए अंग्रेजो के मन में भय पैदा किया तो इसी महानायक की शेर दिली थी जिसने 8 अप्रेल 1929 को सेन्ट्रल असेम्बली में धमाका कर अंग्रेजो सहित अंग्रेजो की खिलाफत करने वाले हर देश को ये सन्देश दिया था की अंग्रेजो के हौसले भी पस्त किये जा सकते है, बशर्ते धमाका करने के लिए एकता और साहस हो ..उस घटना का जिक्र भी जरूरी है जिसके चलते वे और भी मजबूत होकर अंग्रेजो के खिलाफ खड़े होने का साहस करते गए. अस्सेम्बली मे बम धमाके के बाद भगत सिंह चाहते तो वहा से भाग सकते थे पर उन्होंने सबके सामने इन्कलाब जिंदाबाद और भारत माता की जय का उदघोष करते हुए अपनी गिरफ्तारी दी. जेल मे रहने के दौरान भगत सिंह के सब्र और साहस के साथ साथ आत्म आंकलन का भी कड़ा परिक्षण हुआ अंग्रेजो ने इस दौरान भगत सिंह और उनके साथियो को तरह तरह के प्रलोभन भी दिए और जब वे नहीं माने तब मानवता की सारी सीमायें लांघते हुए उन्हें बहुत बुरी तरह से प्रताड़ित किया लेकिन वह भगत सिंह थे जिनका शारीर और आत्मा दोनों फौलाद के बने थे जो अंग्रेजो के कठोर से कठोर यातनाओं के सामने नहीं टूटे इस दौरान भगत सिंह ने जेल मे कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार को भी देखा जानवरों से भी बदतर दिए जाने वाले भोजन के विरोध मे उन्होंने अपने साथियो के साथ अनिश्चित कालीन भूख हड़ताल कर दी जो लगातार 117 दिन चली और आखिर क़र इस भूख हड़ताल के सामने ब्रिटिश शासन को झुकना पड़ा और इस आजादी के मतवाले की जीत हुई --------भगत सिंह की बदती लोकप्रियता से अंग्रेजी हुकूमत घबराने लगी और उन्हें जब लगने लगा भगत सिंह झुकने वालो मे से नहीं है और ज्यादा दिन तक उन्हें जेल मे रखना अंग्रेजी हुकूमत के लिए खतरनाक साबित हो सकता था तो उन्होंने एकतरफा निर्णय करते भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को 24 मार्च 1931 को फांसी दिए जाने की सजा सुना दी. भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी को लेकर जहा देश भर मे विरोध प्रदर्शन हुए वही महात्मा गाँधी पर भी भगत सिंह को न बचाने के आरोप लगे इतिहासकार लिखते है की अगर उन दिनों महात्मा गांधी चाहते तो भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु की फांसी की सजा रोकी जा सकती थी -------- अंग्रेजी हुकूमत शंकित थी की कही फांसी वाले दिन देश मे किसी तरह अप्रिय स्थिति न हो जिससे अंग्रेजी हुकूमत डर गयी और उन्होंने 23 मार्च की रात्रि को ही गुपचुप तरीके से भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी.
  • भगत सिंह की शहादत वर्तमान परिवेश मे प्रासंगिक है आज देश मे भ्रष्टाचार, आंतकवाद, नक्सलवाद और अलगाववाद अपनी जड़े जमा चूका है राजनेताओं का नैतिक चरित्र लगभग समाप्त सा हो चूका है केंद्र मे जो सरकार है उसके बहुत से मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप मे जेलों मे बंद है और बहुत से ऐसे है जो अभी कतार मे है आम जनता की परेशानियों से सरकार को जैसे कोई लेना देना ही न हो ,हमारी विदश नीति कमजोर है भगत सिंह ने जिस आत्म स्वाभिमान की लड़ाई लड़ी वह इन नेताओ ने भुला दी है ऐसे मे भगत सिंह के आदर्शो पर चल कर यदि राज नेता और आम नागरिक कुछ सबक लेते है तो सच्चे मन से ऐसा राष्ट्र भक्त को हम सभी की ओर श्रद्धा सुमन अर्पित है ............................... ऐसे वीर सपूत को नमन है

बुधवार, 31 अगस्त 2011

फेसबुक के दिवानों का पहला गेट टू गेदर....

फेसबुक के दिवानों ने अपना पहला गेट टू गेदर का कार्यक्रम आयोजित किया।   छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में संपन्न गेट टुगेदर के इस आयोजन में रायपुर सहित नागपुर कोरबा बिलासपुर राजनांदगाव चिरमिरी के फेस्बुकियो और ब्लागरो  ने हिस्सा लिया। पत्रकार जगत से जुडी बडी हस्तियों ने फेसबुक से बाहर निकलकर एक दूसरे के विचारों को जाना। इस अवसर पर गीत संगीत के माध्यम से फेसबुक बडीज ने खूब इंजॉय भी किया।

http://youtu.be/KHWVyjn171I























मंगलवार, 30 अगस्त 2011

फेसबुक के दिवानों का पहला गेट टू गेदर....

फेसबुक के दिवानों ने अपना पहला गेट टू गेदर का कार्यक्रम आयोजित किया। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजीत इस आयोजन में राजनांदगाव चिरमिरी कोरबा बिलासपुर सहित नागपुर  के ब्लागर ने हिस्सा लिया। पत्रकार जगत से जुडी बडी हस्तियों ने फेसबुक से बाहर निकलकर एक दूसरे के विचारों को जाना। इस अवसर पर गीत संगीत के माध्यम से फेसबुक बडीज ने खूब इंजॉय भी किया।
क्यों रखू मै अब अपनी कलम में स्याही ...
जब कोई अरमान दिल में मचलता ही नहीं ..
न जाने क्यों सभी शक करते है मुझपे ..
जब कोई सुखा फुल मेरी किताब में मिलता ही नहीं..
कशीश तो बहुत थी मेरे प्यार में मगर ..
क्या करू किस्मत से ज्यादा किसी को मिलता ही नहीं ..
अगर खुदा मिले तो उससे अपना प्यार मांग लू..
पर सुना है वह मरने से पहले किसी से मिलते ही नहीं.............